Tuesday, May 26, 2009

कैसे बने फैट से फिट

फिट और फैट ... ये दोनों

शब्द लिखने - सुनने में बेशक एक जैसे लगते हैं लेकिन असल में इन दोनों स्थितियों के बीच भारी फर्क है। यानी फिट होने पर आप तरोताजा , चुस्त - दुरुस्त , स्मार्ट दिखते हैं और बीमारियों से दूर रहते हैं , वहीं फैट यानी मोटापा पर्सनैलिटी खराब करने के साथ - साथ तमाम बीमारियों को भी न्योता देता है। डायबीटीज , हाई ब्लडप्रेशर , कमर दर्द , दिल की बीमारी , घुटने में दर्द जैसी बीमारियों का खतरा मोटापे के साथ काफी ज्यादा बढ़ जाता है।

जानें अपना बीएमआई : यह जानना बेहद जरूरी है कि असल में फिट किसे कहें। इसका सीधा - सा फंडा है बीएमआई यानी बॉडी मास इंडेक्स। बीएमआई जानने का फॉर्म्युला है वजन ( किलो में )/ लंबाई ( मीटर में का स्कवेयर ) । एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए डब्ल्यूएचओ ने 25 और भारत सरकार ने 23 बीएमआई तय किया है। इसकी वजह यह है कि भारतीयों के शरीर में पश्चिमी देशों के लोगों के मुकाबले 5 फीसदी फैट ज्यादा होता है। अगर वहां किसी को 80 किलो का होने पर दिक्कत होगी तो भारतीयों को 75 किलो पर ही परेशानी महसूस होने लगेगी। इसी तरह फैट उनकी पूरी बॉडी में बराबर फैला होता है , जबकि भारतीयों के खास हिस्से खासकर पेट पर फैट जमा होता है।

1. अगर आपका बीएमआई 23 या इससे कम है तो आप फिट हैं।

2. 23 से 25- ओवरवेट

3. 25 से 30- मोटे

4 . 30 से ज्यादा - बेहद मोटे

वजन घटाने का सही तरीका : अगर आप पहले से सचेत हों और पौष्टिक लेकिन कम कैलरी और लो फैट वाले खाने के साथ - साथ नियमित रूप से फिजिकल ऐक्टिव हों या साथ में वॉक , जॉगिंग , स्कीपिंग , साइकलिंग , स्विमिंग जैसी एक्सर्साइज या योग करते रहें तो बीएमआई 23 तक बनाए रखना मुश्किल नहीं है। क्योंकि अगर एक बार वजन अगर बढ़ जाए तो कम करना थोड़ा मुश्किल होता है। इसके लिए सबसे जरूरी है स्पेशलिस्ट से सलाह करके योजना बनाना और उस पर लगातार अमल करना। आमतौर पर लोग वजन घटाने के लिए डाइटिंग को ही एक तरीका मानते हैं और क्रैश डाइटिंग करने लगते हैं , जो सही नहीं है। डाइटिंग का मतलब भूखे रहना नहीं है , बल्कि सही वक्त पर उचित मात्रा में कम कैलरी और लो फैट वाली फाइबर युक्त चीजें खाने से है। असल में जब हम कम खाते हैं तो बॉडी का मैटाबॉलिज्म कम हो जाता है और मिनरल और विटामिन की कमी हो जाती है। इसलिए जरूरी है कि आप भरपूर , लेकिन सही खाना खाएं।

वजन घटाने के लिए हमें थ्री - डाइमेंशनल ( तीन पहलुओं पर ) कोशिश करनी होगी :

1. कैलरी कम लें। शरीर को कम कैलरी मिलेगी तो वह पहले से जमा कैलरी का इस्तेमाल करेगा।

2.ज्यादा कैलरी बर्न करें। एक्सर्साइज और ज्यादा शारीरिक मेहनत करने पर शरीर में जमा फालतू कैलरी बर्न होगी।

3. स्ट्रेस कम करें। इससे आपको भूख ज्यादा लगती है और आप इमोशनल ईटिंग करते हैं।

मसलन , अगर आपने 4 किलो वजन कम करने का टारगिट रखा है तो सबसे पहले खाने में से 1000 कैलरी की कटौती करें। फिर कैलरी खर्च करें। आधे घंटे तेज सैर से 80 कैलरी तक बर्न हो जाती हैं। बाकी के लिए एरोबिक्स , जॉगिंग , स्विमिंग या दूसरी एक्सर्साइज की जा सकती हैं। तीसरी जरूरी चीज है , लाइफस्टाइल में बदलाव। लिफ्ट के बजाय सीढि़यों का इस्तेमाल करें , नौकर से पानी मांगने के बजाय खुद उठकर जाएं , आसपास रिक्शे या दूसरे वीइकल के बजाय पैदल जाएं। इन छोटी - छोटी चीजों से काफी कैलरी काफी खर्च होती हैं।

डाइट और एक्सर्साइज के अलावा वजन घटाने के कुछ और भी तरीके हैं। इनमें से कुछ खुद घर में अपनाए जा सकते हैं तो कुछ के लिए आपको एक्सपर्ट या इंस्टिट्यूट का सहारा लेना होगा।

योग
वजन कम करने का सबसे सटीक और सरल तरीका है योग। कपालभाति , अग्निसार क्रिया , उर्ध्वहस्तोत्तानासन , दुत उत्तानपादासन , हृदय स्तंभासन , द्विपाद साइकलिंग , भुजंगासन , चक्की चालन , उज्जायी प्रणायाम ऐसे आसन हैं , जो वजन कम करने में बेहद मददगार हैं।

कपालभाति : सांस को नाक से बाहर फेंके , जिससे पेट अंदर - बाहर जाएगा। 5- 10 मिनट करें। यह आसन पेट पर जमा चर्बी कम करता है। हाई बीपी वाले धीरे - धीरे करें और कमरदर्द वाले कुर्सी पर बैठकर करें।

अग्निसार : खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलकर हाथों को जंघाओं पर रखें। सांस को बाहर रोक दें। फिर पेट की पंपिंग करें यानी सांस अंदर खींचें , फिर छोड़ें। स्लिप डिस्क , हाई बीपी या पेट का ऑपरेशन करा चुके लोग इसे न करें।

उर्ध्व हस्तोत्तानासन : खड़े होकर पैरों को थोड़ा खोलें। हाथों की उंगलियों को फंसाकर सिर के ऊपर उठा लें। सांस निकालें और कमर को लेफ्ट साइड में झुका लें। इसी तरह दूसरी ओर करें।

दुत उत्तानपादासन : कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के नीचे जमीन पर रखें। दोनों पैरों को 90 डिग्री तक ऊपर उठाएं। इस प्रकार जमीन पर बिना टिकाए बार - बार पैरों को ऊपर - नीचे करते रहें। कमर दर्द वाले इसे न करें।

हृदय स्तंभासन : कमर के बल लेटकर हाथों को जंघाओं के ऊपर रखें। सांस भरकर पैरों को उठाएं। सिर और कमर को उठाएं। इस दौरान शरीर का भार नितंबों पर रहेगा।

द्विपाद साइकलिंग : कमर के बल लेटे - लेटे ही दोनों पैरों को मिलाकर एक साथ साइकलिंग की तरह घुमाएं। थकान होने तक लगातार घुमाते रहें। हाथों को कमर के नीचे सपोर्ट के लिए रखें। यही प्रक्रिया रिवर्स में भी दोहराएं।

भुजंगासन : पेट के बल लेटकर दोनों हाथों को नितंबों के नीचे रखें। सांस भरते हुए आगे से सिर और छाती को ऊपर उठाकर पीछे की ओर मोड़ लें।

चक्की चालन : दोनों पैर सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं और हाथों को आपस में बांध लें। फिर आगे की ओर झुककर चक्की चलाने जैसा अभ्यास करें।

उज्जायी प्राणायाम : थायरॉइड के मरीजों के लिए यह काफी फायदेमंद है। सीधे बैठकर सांस बाहर निकालें। अब सांस भरते हुए गले की मांसपेशियों को टाइट करें और सांस भरते जाएं। साथ ही गले से घर्षण की आवाज करते जाएं। फिर नाक से सांस धीरे - से बाहर निकाल दें।

इन सभी आसनों को 8- 10 बार दोहराएं। अगर सुबह नियमित रूप से ये आसन किए जाएं तो एक महीने में किलो तक वजन कम हो सकता है। आसन खुद भी किए जा सकते हैं , लेकिन शुरुआत अगर किसी एक्सपर्ट या योग गुरु की देखरेख में की जाए तो बेहतर है।

पावर योग : योग की यह तकनीक आजकल काफी चलन में है। योग में जहां एक ही स्थिति में कुछ देर रुकना होता है , वहीं पावर योग में जोरदार और लगातार प्रैक्टिस होती है। इसमें एक ही क्रिया को लगातार कई बार किया जाता है और सारा जोर स्ट्रेंथ और लचक पर होता है। लगातार मूवमंट से पसीना भी ज्यादा निकलता है। ऐसे में वजन जल्दी घटता है , लेकिन प्रैक्टिस रोकने पर मसल टोनिंग कम हो जाती है। यानी बॉडी के लूज होने का खतरा होता है। पावर योग हमेशा एक्सपर्ट की देखरेख में ही करना चाहिए।

आयुर्वेद
आयुर्वेद में इलाज मुख्यत : जड़ी - बूटियों पर आधारित होता है। यह करीब - करीब नेचरोपैथी जैसा ही है। इसमें भी मसाज और स्टीम बेस्ड तकनीक होती है। मसाज के लिए अदरक , कुलष्ठा व दूसरी बूटियों मिला तेल या पाउडर इस्तेमाल किया जाता है। फिर स्टीम दी जाती है। खास पैक भी लगाया जाता है। इन सब तरीकों से फैट मोबलाइज हो जाता है। आयुर्वेद में आमतौर पर 10- 15 सीटिंग में पांच किलो तक वजन घट सकता है। पांच हजार से 20 हजार रुपये तक चार्ज किए जाते हैं। इसका फायदा यह है कि शरीर ढीला नहीं पड़ता और वजन अचानक वापस नहीं आता। बॉडी टोन्ड और शेप में आ जाती है।

होम्योपैथी
मोटापे से छुटकारा पाने के लिए खाना खाने के बाद दिन में तीन बार 10- 15 बूंदें फायटोलका डिकंड्रा क्यू या फ्यूकस वेस क्यू की चौथाई कप पानी में लें। कैल्केरिया कार्ब की 4- 5 गोलियां भी दिन में तीन बार ले सकते हैं। ये दवाएं फैट कम करती हैं और नियमित रूप से लेने पर दो - तीन महीने में असर दिखने लगता है। इन दवाओं का कोई साइड इफेक्ट नहीं है , फिर भी डॉक्टर की सलाह से लेना बेहतर है। इन दवाओं को गंध से दूर रखना चाहिए। लेने से पहले 15 मिनट पहले या बाद में कुछ न खाएं। इस दौरान कच्चे लहसुन व प्याज का सेवन बंद कर दें। दवा लेने से पहले कुल्ला कर लें।

मशीनों का सहारा ( साइंटिफिक )
साइंटिफिक तकनीक का इस्तेमाल एक सपोर्ट सिस्टम के तौर पर किया जाता है। इसमें विभिन्न मशीनों द्वारा मसल एक्टिविटी , ब्लड सर्कुलेशन और शरीर की लचक बढ़ाई जाती है।

वाइब्रेशन : मशीन के जरिए शरीर पर वाइब्रेशंस दी जाती हैं। इससे मांसपेशियों की एक्टिविटी बढ़ती है , जिससे फैट बर्न होता है।

हीट थेरपी : शरीर पर पैड लपेटकर हीट दी जाती है। इससे शरीर का तापमान थोड़ा बढ़ जाता है , जो बेसिक मेटाबॉलिज्म रेट में इजाफा करता है।

अगर आप सिर्फ इन्हीं दोनों तरीकों से वजन कम करना चाहते हैं तो सही नहीं है , क्योंकि इससे स्किन ढीली होने का खतरा होता है। उसके लिए मसाज की सलाह दी जाती है। मशीनी तरीकों से वजन कम करने के लिए दो से तीन हजार रुपये चार्ज किए जाते हैं।

कितना शुद्ध है पीने का दूध...

आम आदमी दूध

की उपयोगिता को लेकर भले ही आश्वस्त हो , पर खुद मेडिकल प्रफेशनल्स में इस बारे में आम सहमति नहीं है। अब तक सिर्फ दूध के प्योर होने को लेकर ही सवाल उठते रहे हैं , पर दूध पीने के फायदों और उसके गुणों पर कोई शक - शुबहा नहीं था। अब यह स्थिति नहीं है। बेशक यह कहना मुश्किल है कि दूध हर उम्र , हर आदमी के लिए फायदेमंद ही होगा। दूध कितना पीया जाए और कौन - सा पीया जाए , इस पर भी विवाद है। पेश है खास रिपोर्ट :

कई तरह के दूध
आमतौर पर दूध में 85 फीसदी पानी होता है और बाकी हिस्से में ठोस तत्व यानी मिनरल्स व फैट होता है। बाजार में गाय - भैंस के अलावा विभिन्न कंपनियों का पैकिट वाला दूध मिलता है। दूध प्रोटीन , कैल्शियम और राइबोफ्लेविन ( विटामिन बी -2) युक्त तो होता ही है , इसमें विटामिन ए , डी , के और ई समेत फॉस्फोरस , मैग्नीशियम , आयोडीन समेत कई मिनरल और फैट तथा एनर्जी भी होती है। इसके अलावा इसमें कई एंजाइम और लिविंग ब्लड सेल्स भी मिलते हैं। डाइटिशंस की मानें तो ये सब पोषक तत्व हमारी मांसपेशियों और हड्डियों के गठन में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन एंटीबॉडीज के रूप में काम करता है और हमें इन्फेक्शन से बचाता है।

1. गाय का दूध
गाय के दूध में प्रति ग्राम 3.14 मिली ग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है। योगाचार्य सुरक्षित गोस्वामी गाय के ताजा दूध को ही उत्तम मानते हैं। बत्रा हॉस्पिटल एंड मेडिकल रिसर्च सेंटर के आयुर्वेद के विभागाध्यक्ष डॉ . मेहर सिंह का भी मानना है कि गाय का दूध भैंस की तुलना में दिमाग के लिए अच्छा है। पर इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ . एच . एस . छाबड़ा के अनुसार कुछ स्टडी बताती हैं कि गाय के दूध से बेहतर है भैंस का दूध। उसमें कम कोलेस्ट्रॉल होता है और मिनरल ज्यादा होते हैं।

2. भैंस का दूध
भैंस के दूध में प्रति ग्राम 0.65 मिली ग्राम कोलेस्ट्रॉल होता है। भैंस के दूध में गाय के दूध की तुलना में 92 फीसदी कैल्शियम , 37 फीसदी आयरन और 118 फीसदी फॉस्फोरस ज्यादा होता है।

3. पैकिट वाला दूध
इस तरह का दूध मदर डेयरी , अमूल , पराग जैसी कंपनियां सप्लाई करती हैं। इसमें विटामिन ए , आयरन और कैल्शियम ऊपर से भी मिलाया जाता है। इसमें भी कई तरह के जैसे फुल क्रीम , टोंड , डबल टोंड और फ्लेवर्ड मिल्क मिलते हैं। फुल क्रीम में फैट सबसे अधिक होता है। इन सभी की अपनी उपयोगिता है , पर डॉक्टरों की राय है कि बच्चों के लिए फुल क्रीम दूध बेहतर है तो बड़ों के लिए कम फैट वाला दूध। यहां पर हम सिर्फ मदर डेयरी के विभिन्न प्रकार के दूध और उनमें फैट की मात्रा की जानकारी दे रहे हैं :

1. फुल क्रीम : फैट 6 फीसदी

2. स्टैंडर्डाइज : फैट 4 फीसदी

3. टोंड : फैट 3 फीसदी

4. डबल टोंड : फैट 1.5 फीसदी

5. स्किम्ड : फैट 0.5 फीसदी

6. गाय : फैट 3.5 फीसदी

इनके अलावा बकरी का दूध , ऊंटनी का दूध , फ्लेवर्ड मिल्क और सोयाबीन का भी दूध होता है।

गर लेना हो होम लोन

जमीन की कीमतों में आए ठहराव और तमाम बैंकों द्वारा होम लोन की ब्याज दरों में की जा रही कटौती के चलते यह सही वक्त है, जब आप होम लोन लेकर

अपने घर का सपना साकार कर सकते हैं। क्या तरीका है होम लोन लेने का? कितनी अमाउंट का लोन आपको मिल सकता है? लोन लेने के लिए किन-किन कागजात की जरूरत होगी? एक्सर्पट्स से बात करके होम लोन से जुड़े ऐसे ही सवालों के जवाब तलाशे हैं प्रभात गौड़ ने-

कितनी तरह के होम लोन

घर खरीदने के लिए लोन : घर खरीदने के लिए लिया जाने वाला लोन। होम लोन का मतलब आमतौर पर इसी लोन से लगाया जाता है।

घर में इंप्रूवमंट के लिए लोन : अगर आप घर को रेनोवेट कराना चाहते हैं या कुछ मरम्मत आदि करानी है, तो यह लोन लिया जा सकता है।

कंस्ट्रक्शन लोन : आपके पास प्लॉट (जमीन) पहले से हो तो उस पर मकान बनाने के लिए लिया जाने वाला लोन।

कन्वर्जन लोन : मान लीजिए आप जिस मकान में रह रहे हैं, उसके लिए आपने होम लोन लिया है। अब आप दूसरा घर खरीदना चाहते हैं, जिसके लिए आपको और पैसे की जरूरत है। कन्वर्जन लोन के माध्यम से पुराना लोन नए घर के लोन पर ट्रांसफर हो जाता है। इसमें जो एक्स्ट्रा पैसे की जरूरत होती है, वह भी शामिल होता है। ऐसा करने से कस्टमर पुराने लोन को चुकाने में दिए जाने वाले प्रीपेमंट चार्ज से बच जाता है।

लैंड परचेज लोन : मकान बनाने या सिर्फ इनवेस्टमंट की नजर से अगर आप जमीन खरीद रहे हैं तो लैंड परचेज लोन ले सकते हैं।

किसे मिल सकता है लोन

लोन की शुरुआत होते वक्त लोन लेने वाले की उम्र कम-से-कम 21 साल होनी चाहिए।

लोन मचुअर होते वक्त उम्र 65 साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

लोन लेने वाला या तो सैलरीड हो या सेल्फ एंम्प्लॉयड (अपना कारोबार आदि) हो। अगर कोई प्रॉबेशन पर है तो वह होम लोन का हकदार नहीं है।

कितना मिल सकता है लोन

बैंक आमतौर पर कुल मासिक बचत का करीब 40 गुना लोन देते हैं। सैलरी के रूप में आप महीने में जितनी रकम घर ले जाते हैं, उसमें से घरेलू खर्च में काम आने वाली रकम और किसी दूसरे लोन के लिए चुकाई जा रही ईएमआई की रकम को भी घटा दिया जाता है। इस तरह जो रकम मिलती है, उसका 40 गुना लोन मिलता है। अगर आप बिजनेस में हैं तो आपकी आमदनी नेट प्रॉफिट से मानी जाएगी, न कि कुल टर्नओवर से। वैसे, अलग-अलग बैंकों का अलग-अलग फॉर्म्युला होता है और लोन की रकम प्रॉपर्टी की कीमत पर भी निर्भर करती है। ज्यादातर बैंक प्रॉपर्टी की कीमत का 80 से 85 फीसदी तक लोन दे देते हैं, लेकिन यह सब बैंक पर निर्भर करता है। प्रॉपर्टी की कीमत प्रॉपर्टी की असली कीमत और रजिस्ट्री पर आने वाला खर्च भी शामिल होता है।

लोन लेने का प्रोसेस

1. एप्लिकेशन भरना

जरूरी डॉक्यूमंट्स के साथ ऐप्लिकेशन फॉर्म जमा किया जाता है। जरूरी कागजात ये हैं :

आइडेंटिटी प्रूफ : वोटर आईडी, पैन कार्ड, पासपोर्ट, फोटो क्रेडिट कार्ड आदि में से कोई एक।

रेजिडेंस प्रूफ : राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट, रेंट अग्रीमंट।

इनकम प्रूफ : अगर अपना काम है तो इनकम टैक्स रिटर्न की पिछले तीन साल की कॉपी, अगर नौकरी करते हैं तो फॉर्म 16 और पिछले तीन महीने की सैलरी स्लिप, पिछले छह महीने की बैंक स्टेटमंट।

एम्प्लॉयमंट डीटेल : अगर नौकरी करते हैं और आपकी कंपनी जानी-मानी नहीं है तो कंपनी का लेटर।

प्रोसेसिंग फीस : ऐप्लिकेशन फॉर्म जमा करने के वक्त बैंक कस्टमर से प्रोसेसिंग फीस भी चार्ज करता है। यह अमूमन लोन की कुल रकम का आधे से 1 फीसदी होता है। कुछ बैंक प्रोसेसिंग फीस नहीं भी लेते हैं।

बात पते की : कुछ बैंक प्रोसेसिंग फीस को लेकर फ्लेक्सिबल होते हैं, इसलिए इस पर मोलभाव करके फीस को कम कराया जा सकता है। लोन अप्लाई करते वक्त ज्यादा से ज्यादा प्रूफ पेश करें। इससे आपका केस स्ट्रॉन्ग होता है।

2. पर्सनल वेरिफिकेशन

ऐप्लिकेशन जमा करने के एक या दो दिन बाद बैंक आपके द्वारा दी गई सभी सूचनाओं को वेरिफाइ करता है। कस्टमर की इनकम, अड्रेस, आइडेंटिटी आदि जांचने का काम किया जाता है।

बात पते की : इस प्रॉसेस में बैंक कई बार कॉल करके आपका वेरिफिकेशन कर सकता है। इसलिए इस प्रोसेस को पूरा करने के लिए थोड़ा वक्त निकालकर रखें और बार-बार कॉल आने पर चिढ़ें नहीं।

3. हरी झंडी

आपके द्वारा दी गई जानकारी और उसके वेरिफिकेशन से अगर बैंक संतुष्ट है तो वह आपके लोन को हरी झंडी दिखा देगा, नहीं तो उसे रिजेक्ट कर देगा। वैसे अगर ऐप्लिकेशन रिजेक्ट की जा रही है तो बैंक आमतौर पर बैंक इसकी कोई वजह नहीं बताते। कस्टमर की रीपेमंट कपैसिटी का आकलन करके यह भी तय कर लिया जाता है कि उसे कितना अमाउंट सैंक्शन होगा।

4. ऑफर लेटर

इसके बाद बैंक तमाम सूचनाओं के साथ कस्टमर को ऑफर लेटर देता है, जिसकी एक कॉपी को साइन करके कस्टमर बैंक को लौटाता है।

बात पते की : ऑफर लेटर में दी गई लोन अमाउंट, अवधि और ब्याज दर को चेक कर लें कि क्या वह वही है जो आपके साथ तय की गई थी। ब्याज की दर पर कुछ मोलभाव किया जा सकता है।

5. प्रॉपर्टी वेरिफिकेशन

इसके बाद बैंक आपकी प्रॉपर्टी की कानूनी वैधता को चेक करता है। अपने लीगल डिपार्टमंट की मदद से बैंक प्रॉपर्टी के सभी ओरिजनल डॉक्यूमंट्स को वेरिफाई करके यह सुनिश्चित करता है कि प्रॉपर्टी हर तरीके से कानूनी है। इसके बाद बैंक अपने एक्सपर्ट्स को साइट पर भेजकर भी प्रॉपर्टी का वेरिफिकेशन कराता है और उसके बाद वैल्यूअर प्रॉपर्टी का वैल्यूएशन करता है।

बात पते की : यह महत्वपूर्ण पॉइंट है। हर कस्टमर को कराना चाहिए। कई बार बैंक लीगल वेरिफिकेशन के लिए कस्टमर से चार्ज करते हैं। इसके लिए मोलभाव कर सकते हैं। अगर लीगल वेरिफिकेशन के बाद बैंक लोन ओके कर देता है तो कस्टमर को खुश हो जाना चाहिए, क्योंकि इसका मतलब है कि उसके द्वारा ली जा रही प्रॉपर्टी कानूनी रूप से पूरी तरह सेफ है। उसमें कोई धोखा नहीं है।

6. अग्रीमंट साइन

इसके बाद लोन अग्रीमंट साइन हो जाता है और कस्टमर के नाम पर प्रॉपर्टी के ट्रांसफर होने के ओरिजनल कागजात बैंक में जमा हो जाते हैं। इसके बाद बैंक इस बात के सबूत मांगता है कि प्रॉपर्टी खरीदने के लिए लोन के अलावा जो रकम आपको देनी है, वह आपने पे कर दी है। बैंक कस्टमर से 36 पोस्ट-डेटेड चेक भी जमा कराता है जिनसे रीपेमंट होता रहे।

बात पते की : ध्यान रखें कि लोन अमाउंट का जो चेक बैंक इश्यू करेगा, वह प्रॉपर्टी बेचने वाले के नाम होगा, कस्टमर के नाम नहीं। ज्यादातर बैंक उसी दिन से ब्याज लेना शुरू कर देते हैं, जिस दिन चेक इश्यू होता है। आपको चेक कब सौंपा गया, इससे कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए जिस दिन चेक इश्यू हो कोशिश करनी चाहिए कि उसी उसे बैंक से ले लिया जाए। प्रॉपर्टी के ऑरिजनल कागजात बैंक में जमा हो जाते हैं, इसलिए इन कागजात की फोटोस्टेट कॉपी अपने पास जरूर रख लें। कई बार बैंक प्रॉपर्टी के कागजात खो देते हैं। ऐसे में बैंक यह कह सकता है कि उसके पास कागज जमा ही नहीं कराए गए। इसलिए जिस वक्त आप प्रॉपर्टी के ऑरिजनल कागजात जमा कराएं तो बैंक से उसका सटिर्फिकेट भी ले लें।

7. बैंक से चेक आना

अगर प्रॉपर्टी रहने के लिए तैयार है तो लोन का भुगतान एक बार में ही हो जाता है। लेकिन अगर मकान बन रहा हो तो लोन अमाउंट का भुगतान कई हिस्सों में होता है। अगर भुगतान कई हिस्सों में होना है तो बैंक पहले हिस्से के भुगतान के बाद तुरंत ईएमआई शुरू नहीं करता। ईएमआई तब शुरू होती है, जब पूरे अमाउंट का भुगतान हो जाता है। ऐसे में बैंक भुगतान की गई रकम पर तब तक साधारण ब्याज चार्ज करता है, जब तक पूरी रकम का डिस्बर्समंट नहीं हो जाता। इसे प्री-ईएमआई कहा जाता है। इसके लिए बैंक आमतौर पर छह पोस्टडेटेड चेक लेते हैं।

बात पते की : प्रीईएमआई समय से अदा करना सुनिश्चित करें, नहीं तो बैंक लेट फीस चार्ज कर सकता है। किस्त की अदायगी बिल्डर को करने के फौरन बाद उससे ली गई रसीद को बैंक में जमा कराएं।

फिक्स्ड रेट या फ्लोटिंग?

फिक्सड रेट: फिक्स्ड रेट पर लोन लेने से कस्टमर को पूरी अवधि के दौरान बराबर ईएमआई देनी होती है। अगर एक्सपर्ट्स आने वाले समय में ब्याज में बढ़ोतरी की संभावना जाहिर कर रहे हैं तो फिक्स्ड रेट पर लोन लेना ठीक है।

फायदे : इस पर बाजार में हो रहे उतार-चढ़ाव और घटती-बढ़ती ब्याज दरों का कोई असर नहीं होता। हमेशा के लिए एक-सी ईएमआई फिक्स हो जाती है। सुरक्षा का भाव रहता है।

नुकसान : यह फ्लोटिंग रेट के मुकाबले 1 से 2.5 फीसदी ज्यादा होती है। अगर कभी ब्याज दरों में गिरावट आ जाए तो भी कस्टमर की ईएमआई में कमी नहीं होती। कई बार फिक्स्ड रेट पूरी अवधि के लिए न होकर सिर्फ कुछ सालों के लिए होता है। कुछ साल बाद इसमें बढ़ोतरी कर दी जाती है। इस पॉइंट को बैंक से साफ कर लें।

फ्लोटिंग रेट: फ्लोटिंग रेट होम लोन एक बेस रेट और फ्लोटिंग एलिमंट का मिक्सचर होते हैं। अगर बेस रेट में अंतर आएगा तो फ्लोटिंग रेट में भी अंतर आ जाएगा। लोन की अवधि के दौरान यह घटता-बढ़ता रहता है।

फायदे : फिक्स्ड रेट के मुकाबले अमूमन 1 से ढाई फीसदी कम होता है यानी पैसे की सेविंग होती है। बढ़ते-बढ़ते कभी-कभी यह फिक्स्ड रेट से ऊपर भी निकल सकता है, लेकिन ऐसा कुछ समय के लिए ही होता है। कुछ समय बाद यह रेट फिर से फिक्स्ड रेट से नीचे आ जाता है।

नुकसान : ईएमआई में बदलाव होता रहता है, जिसके चलते बजटिंग में दिक्कत होती है।

बात पते की : होम लोन लेने वाले तकरीबन 90 फीसदी लोग फ्लोटिंग रेट पर होम लोन लेते हैं, फिर भी बजटिंग सुरक्षा और सरटेनिटी अगर आपकी प्रायॉरिटी हैं तो फिक्स्ड रेट चुन सकते हैं।

कैसे चुनें बैंक
लोन किस बैंक से लेना है, इसका फैसला करते वक्त इन पॉइंट्स को ध्यान में रखें

1. ब्याज की दर कम-से-कम हो।

2. बैंक द्वारा लिया जाने वाला प्रॉसेसिंग चार्ज कम-से-कम हो।

3. अगर समय से पहले लोन की रकम का पूरा भुगतान कर रहे हैं तो बैंक कोई पेनल्टी न वसूलता हो।

4. कोई और छिपे हुए चार्ज न हों।

लोन का रीपेमंट
1. पोस्ट डेटेड चेक : बैंक में 36 पोस्ट-डेटेड चेक जमा करा दिए जाते हैं, जिनसे खुद-ब-खुद ईएमआई की रकम बैंक को मिल जाती है।

2. सीधे एंप्लॉयर से : कई कंपनियां अपने कर्मचारियों को यह सुविधा देते हैं। इस व्यवस्था में कंपनी कर्मचारी की सैलरी से ईएमआई की रकम काटकर बैंक को दे देती है और बाकी सैलरी कर्मचारी के अकाउंट में आ जाती है।

3. कैश पेमंट : ईएमआई आप ड्राफ्ट या कैश की मदद से हर महीने भी बैंक में जमा करा सकते हैं। हालांकि, कुछ बैंक ऐसी सुविधा नहीं देते।

4. ईसीएस : ईएमआई अदा करने का कारगर तरीका है। इस व्यवस्था में ईएमआई की रकम हर महीने आपके बैंक अकाउंट से अदा की जाती रहती है।

प्रीपेमंट/प्रीक्लोजर
लोन ली गई रकम का प्रीपेमंट जब चाहे तब किया जा सकता है। आप चाहें तो कुछ रकम वक्त से पहले अदा कर दें और चाहें तो पूरी रकम। कुछ बैंक कहते हैं कि कुछ निश्चित बार ही आप प्रीपेमंट कर सकते हैं। कुछ समय पहले तक प्रीपेमंट करने पर बैंक कुछ फीस चार्ज करते थे, लेकिन अब बढ़ते कॉम्पिटीशन के चलते कुछ बैंकों ने यह फीस चार्ज करना बंद कर दिया है। आमतौर पर यह फीस आउटस्टैंडिंग रकम का 2 फीसदी होती है।

जब लोन का पूरा पेमंट हो जाए (चाहे प्रीपेमंट के जरिये या फिर वक्त पर) तो बैंक से अपनी प्रॉपर्टी के ऑरिजनल पेपर्स ले लें। साथ ही बैंक से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट भी लें। कई बार बैंक एक सर्टिफिकेट भी जारी कर देते हैं कि प्रॉपर्टी अब मॉर्गिज में नहीं है। अगर आपका लोन सैंक्शन होते वक्त गारंटर्स भी थे तो बैंक उनके लिए अलग से सर्टिफिकेट इश्यू करेगा कि अब उनकी जिम्मेदारी खत्म हुई।

होम लोन का टैक्स बेनिफिट
होम लोन को लौटाने में जो ईएमआई दी जाती है, उसका कुछ हिस्सा प्रिंसिपल अमाउंट होता है और कुछ हिस्सा ब्याज। जो रकम ब्याज के रूप में अदा की जाती है उस पर इनकम टैक्स के सेक्शन 24 बी के तहत टैक्स में राहत मिलती है। इसकी सीमा डेढ़ लाख रुपये है। जो रकम प्रिंसिपल अमाउंट के तौर पर अदा की जाती है, उस पर 80सी के तहत छूट मिलती है। इसे एक लाख रुपये की सीमा के अंदर काउंट किया जाता है। इसके लिए बैंक द्वारा जारी किया गया सर्टिफिकेट पेश करना होता है, जिसमें बताया जाता है कि आपने पूरे साल के दौरान कितनी रकम प्रिंसिपल के तौर पर अदा की और कितनी ब्याज के तौर पर।

होम लोन का इंश्योरंस
अक्सर लोग इस डर के चलते होम लोन नहीं लेते कि अगर कोई अनहोनी हो गई तो लोन की रकम कौन चुकाएगा। इसके लिए इंश्योरंस कंपनियां कस्टमर द्वारा लिए गए होम लोन का इंश्योरंस ऑफर करती हैं। होम लोन का इंश्योरंस कराने के बाद अगर कस्टमर की असमय मौत हो जाती है तो बची हुई रकम का भुगतान इंश्योरंस कंपनी करती है। इंश्योरंस के प्रीमियम के तौर पर दी जा रही रकम पर इनकम टैक्स में छूट भी मिलती है। कंपनियां कई तरह के ऑप्शंस देती हैं, फिर भी आमतौर पर दो तरह के प्लान हैं।

सिर्फ इंश्योरेंस प्लान : इसमें लोन रीपेमंट की अवधि के दौरान मौत हो जाने पर रीपेमंट की जिम्मेदारी कंपनी की होगी। लेकिन, अगर एक बार आपका रीपेमंट पूरा हो गया तो इंश्योरंस खत्म हो जाता है और कस्टमर को कंपनी की तरफ से सिर्फ सम अश्योर्ड ही मिलता है। बोनस आदि कुछ नहीं मिलता। इस तरह की स्कीमों में प्रीमियम की रकम कम होती है।

इंश्योरंस के साथ इनवेस्टमंट प्लान : इसमें होम लोन के रिस्क कवर के साथ इनवेस्टमंट संबंधी फायदे भी मिलते हैं। रीपेमंट पूरा हो जाने के बाद कस्टमर को सम अश्योर्ड के साथ उस वक्त तक बोनस भी मिलता है। इस तरह की पॉलिसीज में प्रीमियम की रकम थोड़ी ज्यादा होती है।

बात पते की : कई बैंक होम लोन देते वक्त होम लोन के इंश्योरंस की व्यवस्था भी साथ ही कर देते हैं यानी आपकी ईएमआई में होम लोन के इंश्योरंस के प्रीमियम की रकम भी जोड़ ली जाती है। कुछ बैंकों के इंश्योरंस कंपनियों से टाईअप होते हैं। ऐसे में बैंक से होम लोन लेते वक्त ही होम लोन के इंश्योरंस की बात भी कर लेनी चाहिए। अगर आपका लाइफ इंश्योरंस है, फिर भी लोन का इंश्योरंस कराना चाहिए।

5 कॉमन मिस्टेक्स
टॉप-अप लोन लेना: टॉप-अप लोन होम लोन के साथ दिया जाने वाला एडिशनल लोन होता है, जिसका मकसद मकान के इंटीरियर डेकोरेशन और इसी तरह के दूसरे खर्चों को पूरा करना होता है। कुछ बैंक होम लोन के साथ टॉप-अप लोन का भी ऑफर देते हैं। लोग आमतौर पर इन लोन को ले लेते हैं और बाद में उन्हें पता चलता है कि टॉप-अप लोन को पर्सनल लोन के तौर पर ट्रीट किया जाता है, जिसकी ब्याज की दर होम लोन की दर से कहीं ज्यादा होती है।

नेगेटिव अमॉर्टाइजेशन: नेगेटिव अमॉर्टाइजेशन की स्थिति तब आती है जब किसी खास अवधि में बैंक लोन की किस्त कम कर देते हैं। इस तरह की सुविधा वाला लोन यंग प्रफेशनल्स के लिए ऑफर किया जाता है। इसमें शुरुआती बरसों में सिर्फ ब्याज की रकम वसूलकर ईएमआई को कम दिखा दिया जाता है। दो साल बाद आपको पता चलता है कि प्रिंसिपल के रूप में आपने कुछ भी अदा नहीं किया है और इस तरह आपके द्वारा वापस की जाने वाली राशि लगभग ज्यों की त्यों बनी रहती है।

प्रॉपर्टी किसी के नाम, लोन किसी के नाम
अक्सर लोग किसी और के नाम पर मौजूद प्रॉपर्टी पर लोन लेने की गलती कर देते हैं। इसे इस उदाहरण से देखिए। मिस्टर शर्मा की मां के नाम कुछ जमीन थी। उन्होंने उस जमीन पर घर बनाने के लिए होम लोन अपने नाम पर ले लिया। ऐसी गलती न करें। अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो आपको होम लोन पर कोई टैक्स बेनिफिट नहीं मिलेगा।

कल के बल पर लोन
कई बार यंग प्रफेशनल्स इस उम्मीद में कूवत से ज्यादा लोन ले लेते हैं कि आने वाले वक्त में उनकी आमदनी बढ़ जाएगी, लेकिन आजकल के माहौल में इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आने वाले साल में आपकी आमदनी बढ़ ही जाएगी। ऐसे में कल आमदनी बढ़ जाने के भरोसे लिए गए लोन की रीपेमंट करना मुश्किल काम हो सकता है।

बैंक चुनने में जल्दबाजी
कई बार प्रॉपर्टी का चुनाव करने से पहले ही लोग लोन लेने के लिए बैंक से बात करना शुरू कर देते हैं। पहले प्रॉपर्टी फाइनल करें, फिर बैंक से लोन की सैंक्शन लें। कई बैंक रहने के लिए तैयार मकान पर ही लोन देते हैं। इसके अलावा, याद रखें कि बैंकों की सभी टर्म नेगोशिएबल होती हैं। बैंक का फैसला कई बैंकों से जानकारी लेने के बाद ही करें, तो अच्छा है।

बड़ा धोखा है क्रेडिट कार्ड में...

आज के दौर में क्रेडिट कार्ड फैशन स्टेटमेंट की बजाए एक जरूरत बन गया है, लेकिन इसका इस्तेमाल करने

वाले लोग अक्सर तमाम शिकायतें करते नजर आते हैं। थोड़ी-सी लापरवाही और कुछ नासमझी के चलते लोग अक्सर धोखा उठा बैठते हैं। क्या हैं क्रेडिट कार्ड से जुड़े सामान्य घपले? कार्ड यूज करते वक्त एक आम कस्टमर को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है? आमतौर पर लोग क्या गलतियां करते हैं? इसी के बारे में जानते हैं

क्रेडिट कार्ड से संबंधित शिकायतें करने के लिए लोगों को आमतौर पर लोगों के कस्टमर केयर का ही नंबर पता होता है, लेकिन अगर वहां सुनवाई न हो तो आगे भी शिकायत की जा सकती है। शिकायत दर्ज कराने की पूरी प्रक्रिया पर आरबीआई, नई दिल्ली के रीजनल डायरेक्टर आर. गांधी से बातचीत की

क्रेडिट कार्ड से संबंधित शिकायतों की सुनवाई अगर संबंधित बैंक न करे तो क्या करें?

ऐसे में बैंकिंग ओम्बड्समन के ऑफिस में शिकायत की जा सकती है। हर राज्य की रिजर्व बैंक अव इंडिया (आरबीआई) की ब्रांच में यह कार्यालय होता है। कई छोटे राज्यों में दो राज्यों की मिलाकर एक ही ब्रांच होती है। जैसे दिल्ली में दिल्ली और जम्मू-कश्मीर की साझी ब्रांच आरबीआई में है। बैंकिंग ओम्बड्समन में शिकायत तभी दर्ज होगी, जब बैंक आपकी शिकायत पर एक महीने तक कोई कार्रवाई नहीं करता। बैंकिंग ओम्बड्मन में शिकायत या तो लिखित करें या फिर ई मेल करें। साथ ही अपने बैंक को की गई शिकायत की रिसीविंग भी जरूर लगाएं। बैंकिंग ओम्बड्समन की शिकायत ऑनलाइन भी की जा सकती है।

पता : बैंकिंग ओम्बड्समैन, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया बिल्डिंग, दूसरी मंजिल, ६ संसद मार्ग, नई दिल्ली

फोन : 011-23725219

ईमेल: bonewdelhi@rbi.org.in

वेबसाइट: www.bankingombudsman.rbi.org.in

ओम्बड्समन के पास शिकायत करने के कितने दिन बाद कार्रवाई पूरी हो जाती है?

वैसे तो ओम्बड्समन के पास की गई शिकायत पर कार्रवाई की कोई टाइम लिमिट नहीं है। फिर भी आमतौर पर तीन महीने के अंदर मामलों का निपटारा हो जाता है।

बिल की ड्यू डेट से कितने दिन पहले कस्टमर को बिल मिल जाना चाहिए? क्या इस बारे में आरबीआई ने कोई नियम बनाए हैं?

आरबीआई ने ऐसे नियम तो नहीं बनाए हैं पर हर बैंक को अपने कस्टमर को इस बारे में पहले ही बता देना चाहिए। यह निर्देश आरबीआई ने सभी बैंकों को पहले से ही दे रखा है कि अपने कस्टमर्स को इस बारे में आगाह कर दे। जो बैंक ऐसा नहीं कर रहे, उनके बारे में आरबीआई के डिपार्टमंट ऑफ बैंकिंग सुपरविजन में शिकायत की जा सकती है।

लेट फीस और उस पर लगने वाले ब्याज के लिए क्या कोई सीलिंग है?

नहीं, सीलिंग का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। इस बारे में अभी तक बैंकों पर ही छोड़ा गया है कि वे कितना सर्विस चार्ज या ब्याज लें। लेकिन उन्हें निर्देश दिए जा चुके हैं कि वे इस बारे में शुरू में ही कस्टमर को अपनी शर्ते बता दें और पूरी पारदर्शिता से काम करें। नैशनल कंज्यूमर फोरम ने भी इस बारे में कुछ निर्देश दिए है लेकिन उन पर बैंकों द्वारा केस लड़ा जा रहा है।


इन दिनों क्रेडिट कार्ड रखना लग्जरी या फैशन से कहीं ज्यादा जरूरत बन गया है। यह सुविधाजनक और फायदेमंद दोनों है। लेकिन अक्सर लोग क्रेडिट कार्ड को लेकर तमाम दिक्कतों का सामना भी कर रहे होते हैं।

क्रेडिट कार्ड कैसे-कैसे

कंपनियां आमतौर पर तीन तरह के कार्ड मुहैया कराती हैं - वीजा, मास्टर और एमैक्स। इन तीन कटिगरी में भी गोल्ड, सिल्वर और क्लासिक/इग्जेक्युटिव तीन सब-कटिगरी होती हैं। इन तीनों में मिलनेवाली सुविधाएं अलग-अलग होती हैं।

आमतौर पर गोल्ड कार्ड में सबसे ज्यादा इन्शुअरन्स कवर, बैगेज कवर, डिस्काउंट, रिवॉर्ड पॉइंट और दूसरी सुविधाएं दी जाती हैं। इस पर ब्याज भी सबसे कम वसूला जाता है, लेकिन इसकी फीस व सर्विस चार्ज सबसे ज्यादा होते हैं। कार्ड जारी करने के लिए यों तो कोई खास नियम नहीं हैं लेकिन साधारण कार्ड आमतौर पर उन लोगों के जारी किए जाते हैं, जिनकी सालाना कमाई कम-से-कम 70 हजार रुपये हो, जबकि गोल्ड कार्ड के लिए सालाना कमाई 1.80 लाख रुपये होनी चाहिए।

क्या हैं फायदे

हमेशा अपने साथ कैश लेकर चलना सुविधाजनक नहीं है। ऐसे में क्रेडिट कार्ड सहूलियत भरी शॉपिंग कराता है। क्रेडिट कार्ड कंपनियां अपने कस्टमर्स को एक निश्चित अवधि के लिए फ्री क्रेडिट पीरिअड की सुविधा देती हैं। यह अवधि स्टेटमंट डेट से लेकर पेमंट डेट तक की होती है। आमतौर पर यह 20 दिन का वक्त होता है। इस अवधि में कोई ब्याज नहीं लगता।

आप क्रेडिट लिमिट के अंदर चेक जारी कर सकते हैं और फोन पर ही ड्राफ्ट का ऑर्डर भी दे सकते हैं। ग्लोबल कार्ड के जरिए आप दूसरे देश में खरीदारी कर रुपये में भुगतान कर सकते हैं। क्रेडिट कार्ड कंपनियां दुकानों, होटेलों और एयर टिकिट आदि पर डिस्काउंट ऑफर करती हैं।

पर्सनल एक्सिडंट कवर और बैगेज कवर आदि की सुविधा भी दी जाती है। बैगेज कवर ज्यादातर गोल्ड व इंटरनैशनल क्रेडिट कार्ड पर ही दिया जाता है।कई कंपनियां परचेज प्रॉटेक्शन भी देती हैं। ऐसे में कार्ड से खरीदी गई चीजों के खोने, चोरी होने या आग आदि से नष्ट हो जाने पर आपको उसका बिल नहीं भरना पड़ेगा।

क्रेडिट शील्ड होना भी फायदेमंद है। अगर कार्ड होल्डर की मौत हो जाए और उसके कार्ड पर यह सुविधा है तो उत्तराधिकारी को बिल में कुछ छूट मिल जाती है। कार्ड कंपनियां शॉपिंग पर रिवॉर्ड पॉइंट्स भी देती हैं।

क्या हैं नुकसान

क्रेडिट कार्ड कई बार फिजूल की शॉपिंग की वजह बनता है। खासकर ऐसे लोग कार्ड की बदौलत ज्यादा शॉपिंग कर लेते हैं, जिन्हें शॉपिंग की लत होती है। फ्री क्रेडिट पीरिअड के बाद लगने वाला ब्याज काफी ज्यादा होता है। कार्ड इश्यू करने के लिए कंपनियां आमतौर पर फीस लेती हैं, जो सालाना 400 रुपए से लेकर दो हजार रुपए तक हो सकती है। कार्ड बनवाने के लिए भी कई मामलों में सौ से लेकर एक हजार रुपये तक फीस होती है।

कई बार क्रेडिट कार्ड चोरी हो जाता है या खो जाता है। ऐसे में उसके मिसयूज का डर होता है। इससे बचने के लिए सबसे पहले कस्टमर केयर को फोन करें और अपना कार्ड तुरंत बंद करा दें। इसके लिए एफआईआर या किसी और डॉक्युमंट की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर चोरी के बाद कार्ड से शॉपिंग की गई है या कोई और फ्रॉड किया गया है तो बैंक एफआईआर की कॉपी मांगता है। कार्ड खो जाने या चोरी हो जाने की सूचना देने के बाद लायबिलिटी फीस की एक अधिकतम सीमा निर्धारित है। ज्यादातर बैंकों के मामले में यह सीमा एक हजार रुपये है। लेकिन कार्ड खोने की रिपॉर्ट करने से पहले इसकी कोई सीमा नहीं है। यानी रिपॉर्ट किए जाने के वक्त तक चुराए गए या खोए हुए कार्ड से जो भी शॉपिंग की जाएगी, उसका भुगतान कार्ड होल्डर को करना होगा।

कार्ड कंपनियां आमतौर पर उस लायबिलिटी का जिक्र करती हैं, जो रिपॉर्ट करने के बाद होती है। रिपोर्ट करने से पहले की असीमित फीस को छिपा लिया जाता है।

आम समस्याएं और समाधान .
फॉर्म रिजेक्शन: कई बार कार्ड कंपनी कस्टमर के ऐप्लिकेशन फॉर्म को रिजेक्ट कर देती हैं। ऐसे में कंपनी कस्टमर को लेटर भेजकर सूचित करती है कि उसकी ऐप्लिकेशन कैंसल कर दी गई है। कई बार कंपनियां ये जानकारी नहीं देतीं। फिर कस्टमर द्वारा जमा कराए गए सेल्फ अटैस्टेड डॉक्युमेंट्स के मिसयूज का भी खतरा होता है। ऐप्लिकेशन रिजेक्ट होने पर कंपनी से अपने डॉक्यूमेंट वापस करने को कहें।

अनसॉलिसिटेड कार्ड: कई बार बिना अप्लाई किए ही क्रेडिट कार्ड बनकर आ जाता है। ऐसी हालत में कस्टमर को बैंक में शिकायत दर्ज करानी होगी कि उसकी सहमति बिना ही उसका क्रेडिट कार्ड बना दिया गया। अगर दो से तीन हफ्ते में बैंक का रिस्पॉन्स नहीं आता है तो बैंकिंग ओम्बड्समन को अप्रोच किया जा सकता है। बैंकिंग ओम्बड्समैन की साइट है www.bankingombudsman.rbi.org.in UÐ

बिल में देरी: कस्टमर्स को बिल अक्सर जमा होने की ड्यू डेट के बाद बिल मिलता है। ऐसे में कंपनियां लेट फीस चार्ज कर लेती हैं। नियमों के मुताबिक कार्ड यूजर को बिल जमा कराने की अंतिम तारीख से 15 दिन पहले मिल जाना चाहिए। अगर बिल में कुछ गड़बड़ है या बिल ज्यादा आया है तो कस्टमर बैंक से उस ज्यादा बिल का डॉक्युमेंटरी प्रूफ मांग सकता है।

कार्ड कैंसिलेशन: अगर कार्ड बंद कराना हो तो सबसे पहले कस्टमर को पूरा पेमंट करना चाहिए। उसके बाद कार्ड को चार हिस्सों में काटकर एक लिफाफे में बंद कर एटीएम में मौजूद बॉक्स में डाल दिया जाता है। लेकिन कई बार कार्ड कैंसल कराने की गुजारिश के बावजूद कार्ड के चालू रहने और फीस आने की शिकायतें आती रहती हैं। ऐसे में तुरंत बैंक से संपर्क करें और कार्ड बंद करवाएं।

लेट फीस: ड्रॉप बॉक्स में अंतिम तारीख को या उससे पहले चेक डाल देने पर भी कंपनियां लेट फीस लगा देती हैं, जबकि अगर कस्टमर ने ड्यू डेट से पहले चेक ड्रॉप बॉक्स में डाल दिया है तो उस पर लेट फीस नहीं लगाई जानी चाहिए। अगर ऐसा हो रहा है तो अपनी कंपनी से इस बारे में बात करें और लेट फीस को बिल में एडजस्ट कराएं।

ज्यादा बिल: कई बार कस्टमर्स के पास ज्यादा बिल भेज दिया जाता है। ज्यादा बिल आने पर कस्टमर केयर में कॉल करें और बिल के बारे में स्थिति साफ करें। इसके अलावा एक और बात ध्यान रखें। अगर आप अपना पेमंट कैश कर रहे हैं तो कई कार्ड कंपनियां फाइन लगा देती हैं, इसलिए इस बारे में पता कर लें और कोशिश करें कि पेमेंट चेक के माध्यम से ही किया जाए।

इग्जेक्युटिव सुविधा: कार्ड कंपनियों की तरफ से कई बार कस्टमर के पास फोन आता है कि क्या वे उनके बिल की पेमंट के लिए अपना इग्जेक्युटिव भेज दें। कस्टमर को यह सुविधाजनक लगता है और ज्यादातर लोग इसके लिए हामी भर देते हैं। कस्टमर के हां करते ही इग्जेक्युटिव पेमेंट लेने आ जाता है, लेकिन याद रहे इस सुविधा के लिए कई कंपनियां पैसे चार्ज कर लेती हैं।

इन्शुअरन्स प्रीमियम: कुछ प्रीमियम क्रेडिट कार्ड पर कई तरह का कवर भी होता है। अगर कंपनी कस्टमर को बताकर यह सुविधा दे रही है, तब तो ठीक है, लेकिन कई कंपनियां बिना बताए ही कस्टमर को इन्शुअरन्स कवर दे देती हैं और बिना कस्टमर को बताए प्रीमियम की रकम काटी जाती रहती है। कंपनियां इस बात की भी परवाह नहीं करती कि जिस कस्टमर को वह इन्शुअरन्स कवर दे रही हैं, उसने किसी को नॉमिनेट भी किया है कि नहीं।

कैसे करें शिकायत

क्रेडिट कार्ड से जुड़ी कई तरह की दिक्कतें कस्टमरों को झेलनी पड़ती हैं। कोई भी समस्या होने पर कार्ड यूजर को तुरंत शिकायत दर्ज करानी चाहिए। अगर शिकायत कॉल सेंटर में कराई जा रही है तो शिकायत दर्ज कराते वक्त शिकायत नंबर, डेट और उस व्यक्ति का नाम जरूर पता कर लें, जिसे आपने शिकायत लिखाई है। कई बार कस्टमर केयर पर शिकायत की सुनवाई न होने की शिकायतें आती हैं। ऐसे में सीनियर अधिकारी से बात करने को कहा जा सकता है। इग्जेक्युटिव उसी नंबर से आपकी कॉल आगे बढ़ा देते हैं। ऐसा न होने पर कंपनी की साइट्स पर दिए गए ईमेल व नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है। अगर खुद बैंक में जाकर शिकायत लिखा रहे हैं तो शिकायत की रिसीविंग जरूर ले लें। आरबीआई की गाइडलाइंस के मुताबिक हर बैंक की एक शिकायत निवारण सेल होती है। शिकायतकर्ता अपने बैंक के ग्रीवांस रिड्रेसल ऑफिसर से भी कॉन्टैक्ट कर सकता है। आरबीआई के मुताबिक इस अफसर का नाम बिल पर लिखा होना चाहिए। बैंक या कॉल सेंटर में दर्ज कराई गई शिकायत पर 30 दिन के अंदर कार्रवाई हो जानी चाहिए। अगर 30 दिन के अंदर बैंक की तरफ से कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाया जाता, तो कस्टमर संबंधित ओम्बड्समन से कॉन्टैक्ट कर सकता है। यहां वह मानसिक पीड़ा, पैसे के नुकसान और हरजाने का दावा कर सकता है।